Sunday, May 21, 2006

आत्मकथा

हर इन्सान स्वयं को समझता है बुद्धिमान
चाहे कोई अन्य उसे दे न यह सम्मान
कुछ ऐसे ही विचार अपने बारे में
हम रखते थे
और इस खुशफहमी में
कभी तुकबन्दी
कभी कविता करते थे
अपनी अक्ल दूजों को भी
क्यों न जाए दिखाई
यह सोचकर मंच पर
हमने अपनी कविता सुनाई ।

"किस से है लिखवाई ?"
इक महिला थी चिल्लाई
"है कहाँ से चुराई ?"
किसी ने आवाज़ लगाई
पाकर ये प्रशंसा
हमें इतनी शर्म आई
कि मंच छोड़ने में
समझी हमने भलाई
आइने से पूछते है
अब जब भी
उसमें तकते है
क्या सच में इतने बुद्धू
हम शक्ल से लगते है ।।???

आइना झूठ नहीं बोलता ,शायद तभी कुछ कहने से डर रहा है
और हम अपना फोटू ब्लाग पर चिपकाने से । वरना हम कोई
ऋितक रोशन से कम थोड़े ही है वो तो उसे राकेश रोशन
जैसे पिता श्री मिल गए तभी इतना हिट हो गया । अगले
जन्म मे अपना मामला भी फिट है। आखिर टोना टोटका जो कर रहे है ।

3 comments:

उन्मुक्त said...

यह कईयों के लिये सच है कम से कम मेरे लिये तो

संजय बेंगाणी said...

भाई सबकी यही कहानी हैं, बस हम अपना फोटू चस्पाने से नहीं हिचकिचाते.

Nishikant Tiwari said...

लहर नई है अब सागर में
रोमांच नया हर एक पहर में
पहुँचाएंगे घर घर में
दुनिया के हर गली शहर में
देना है हिन्दी को नई पहचान
जो भी पढ़े यही कहे
भारत देश महान भारत देश महान ।
NishikantWorld